Friday, January 29, 2010

So, speak up

A long time ago we had killed Gandhi and now, a mature melancholy is spread nation-wide. Words are frozen, direction leads nowhere, the magnetic compass stands indifferent. The noise of machine and voice of mischief is always there day and night making you incapable to keep awake during the day and not allow you to sleep in night. One innocent question arrogantly and abruptly rises before us – What should we do in these circumstances? Is there any answer? If 'no', come with me. If 'yes', lead me. The better proposition or the probationary position would be to march shoulder by shoulder. With the real Gandhi gone, beware of spurious Gandhis and a spurious democracy.

The Judiciary has the answer, Executive has the answer, Legislature also has the answer and even Press has the answer. But nobody is coming forward to provide it. Why? Because they do not intend to. We are always brave in carrying a convenient truth. We don't want to become Gandhi or Galileo. We don't have the courage and conviction to make a jump to uncertain unknown future in lieu of a certain present although we have a long list of the persons who have done so. We can recall a few such Columbus who could manage to keep afloat to reach the sea shore but who failed to reach the end, sank in the sea and are lost ever in our memories. And you must be alert and hear consciously the debate going on the topic of globalization which has no axis, longitude and latitude. There is no interval to this nightmare.

Statistics say that there is a polarization of properity at one end and poverty at other, making the Indian society bipolar. The middle class is losing its meaning and merging to emerge at either side. They are a confused lot. They want to pretend to be rich and in this process they have started looking rich in exterior and have become poorer in their interior. Since Independence there is a steep rise in salary of Administrative officers up to the tune of 7300 percent but what about you? Has your prosperity also increased in the same proportion? I wish to be affirmative but it is not to be. Be it Judiciary, Legislative or Executive everybody has indulged in increasing their salary even without taking you, the people of India, in confidence. Have ever they have taken your mandate? We are marginalised to be reduced as meaningless. We are mere passive spectators. They play us like an instrument whenever they want to play the music of democracy. Our marginalised muffled voice needs an explosive expression but for the want of direction and dictionary we have no place and no words to express our accumulated anguish and agony of our 'dependence' over this type of 'independence'.

We vehemently prayed for justice for last 60 years but there seems no sensitivity of justice in the statue of justice. Justice lacks 'equity', 'trust' and 'faith'. Justice is often a 'circumstantial compromise'. It cannot be classified as 'right' or 'wrong'. Justice is 'just' or 'appropriate' and not always 'accurate'. In our strife-torn society with conflicting interests what is just for one is unjust for others. Where the 'State' is the biggest litigant, to whom are the courts justifying their existence and expenditure? They are just by doing justice to whom – State or litigants? These courts mostly interpret and implement the law which was never enacted by our Legislature. Most of our laws had been enacted by British Parliament so the courts in India are 'often' just towards the state by giving interpretation of an alien law in an alien language. There is a lighter side of law – mainly fed by the ignorance and foibles of men. There are few places where the amusing and exasperating side of human nature can be watched so closely and continually as in a court of law.

The sinful dogma of democracy is the discrimination of the citizens on the line of gender. We need not peep into the undergarments to find out the gender as to whether a citizen is a male, female or simply 'e-mail'. Our citizens must have their own identity rather than being stooges, like so many in top positions our country today. We are yet to give effect to the dreams of Mahatma Gandhi. In a Country where even 'Father of the Nation' was assassinated, how long can we elude the same fate? Gandhi was killed long ago and we have to fight the assassins of democracy before they kill us. Silence is the best defense for a coward. In your bedroom a blanket awaits to warm you. If not, then come out if you have the courage and conviction. There are only two options – 'connivance' for cowards or 'conviction' for those who still want to take the country forward.
(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in February 6, 2010 Issue)

विकल्प नहीं संकल्प

गांधी की हत्या तो हम सब कर ही चुके हैं और अब बिखरी है हमारे बीच एक प्रौढ़ उदासी। शब्द सहमे हैं, दिशाएं संज्ञाशून्य हैं, कुतुबनुमा स्तब्ध है। मंत्र और षड्‌यंत्र का शोर आपको दिन में ढंग से जागने नहीं देता और रात को ठीक से सोने भी नहीं देता। ऐसे में एक मासूम सा सवाल खड़ा होकर पूछ ही बैठता है - हम क्या करें? है कोई उत्तर?

इस सवाल का उत्तर न्यायपालिका के पास है, व्यवस्थापिका के पास है, विधायिका के पास है, पत्रकारिता के पास भी है पर कोई भी उत्तर दे नहीं रहा, क्यों? देना ही नहीं चाहता है। हम सुविधाजनक शब्दों के ही पराक्रमी पल्लेदार हैं। हम गांधी या गैलीलियो नहीं बनना चाहते। निश्चित वर्तमान के बदले अनिश्चित भविष्य में छलांग लगाने वालों की लंबी फेहरिस्त में कुछ कोलम्बस तो हमें याद हैं बाकी तो डूब मरे समुद्र के खारी पानी में। इस बीच कोलम्बस और गूलर के भुनगों के बीच वैश्वीकरण की जो बहस चल पड़ी है उसका न कोई अक्षांश है, न देशान्तर, न इस महास्वप्न का मध्यान्तर।

आंकड़ों की अंगड़ाई से स्पष्ट है कि देश में इस बीच समृद्धि भी बढ़ी है और गरीबी भी। मध्यम वर्ग असमंजस में है अमीर दिखना चाहता है और इस प्रयास में गरीब होता जा रहा है। देश की आजादी से अब तक प्रशासनिक अधिकारियों की तनख्वाह में 7300 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है क्या आपकी भी समृद्धि इसी दर से बढ़ी है? न्यायपालिका हो, विधायिका या व्यवस्थापिका सभी ने स्वयं ही बिना आपसे कोई जनादेश लिए आपकी मुफलिसी का मजाक उड़ाते हुए अपनी तनख्वाह बढ़ा ली और आप देख रहे हैं टुकुर-टुकुर बेजुबान जानवरों जैसे। वेदना को कहीं कह सकने, कहीं उकेर सकने में सक्षम समृद्ध शब्दकोश भी आपके काम नहीं आ रहे। न्यायपालिका का न्याय का संवेदनशील चेतन चेहरा नहीं दिखाई। वहां तो न्याय की मूर्ति यानी न्यायमूर्ति बैठे हैं। मूर्ति हैं तो जड़ होंगे ही फिर आप न्यायिक चेतना की अपेक्षा ही इनसे क्यों करते हैं। 'जस्टिस' तो 'जस्ट' यानी 'उचित' करेगा। किसके लिए उचित 'सत्ता' के लिए या 'जन-गण-मन' के लिए? हमें तो 'न्याय' चाहिए और 'न्याय' का अंग्रेजी अनुवाद है ही नहीं जबकि हमारी न्याय की भाषा तो अंग्रेजी है तो झेलो 'जस्टिस'। जब 'न्यास' यानी ट्रस्ट होगा तभी वह 'न्याय' करेगा। यह न्यायपालिका किस जनादेश से मान्यता प्राप्त है। बात-बात में चुनाव होने वाले इस देश में क्या कभी इसलिए भी चुनाव हुए हैं कि नागरिकों से पूछा जाए कि तुम किस तरह की संसद, विधानसभाएं चाहते हो, कैसी हो तुम्हारी न्यायपालिका और नौकरशाही उनकी तनख्वाह और वेतन भत्ते क्या हों? देश में सबसे कम और सबसे अधिक वेतन का अनुपात क्या हो? जब विसंगतियों की सीमाएं ही नहीं हैं तो कैसा समाज कैसा 'लोकतांत्रिक कल्याणकारी समाजवादी गणराज्य।' लेकिन यहां जनता कुछ नहीं तय करती। जनता जाति देखती है, चित्र नहीं, चरित्र नहीं, लिंग देखती हैं। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दिनाकरन की जाति देखती है, राष्ट्रपति का लिंग देखती है, एक राष्ट्र में महाराष्ट्र बनाकर क्षेत्र देखती है तो फिर गुण तो गौण होंगे ही। नौकरशाही नियंता है और सभी प्रशासनिक अभियानों की अभियंता भी। पर सावधान। जहां मंथरा की चलती है वहां राम को वनवास हो ही जाता है। यह भी याद रखें कि किसी राम का वनवास और जनता का उपवास परस्पर जुड़ी बातें है।

जगह- जगह खींचे जा रहे द्रोपदियों के चीर से संसद के प्राचीर तक दुशासन ही दुशासन दिखाई दे रहे हैं। जब हमारे राष्ट्रपति की 'विशेषता' और 'योग्यता' जानने के लिए शोध की जरूरत हो और पुराने अखबारों की कातर कतरन चीख- चीख कर उनके बैंक घोटालों की चर्चा कर रही हों तब पुरस्कार पराक्रमियों को नहीं परिक्रमा करने वालों को ही मिलेंगे। चाटुकार चटवाल हों या करीना का करीने से काम लगाने वाले कामुक फिल्मी सूरमा सैफ। आप किस कतार में खड़े हैं- सरकार से पुरस्कार पाने वालों की या तिररुकार पाने वालों की?

मूर्तियों में वेदना भी नहीं होती और चेतना भी नहीं होती। हमें न्याय की मूर्तियां नहीं न्याय की चेतना चाहिए। हमें बांझ विधायिका भी नहीं चाहिए कि जो देश को कानून भी न दे पा रही हो क्योंकि हमारे प्राय: सभी प्रमुख कानून अंग्रेजों के बनाए हुए हैं। कल्पना कीजिए कि वह चाहे गांधी के हत्यारे गोडसे हों या गुरु अफजल सभी पर मुकदमा चलाने का 'तंत्र' विदेशी था। वहीं अंग्रेजों का बनाया कानून, अंग्रेजों की बनाई बिल्डिंग और भाषा भी अंग्रेजी। बहुत हो गया देश की अस्मिता की रक्षा के लिए हमें देश का देशी कानून चाहिए, जस्टिस नहीं न्यायाधीश चाहिए। स्त्री, पुरुष या किन्नर की क्या कहें व्यक्ति श्रेष्ठ होना चाहिए। भारत एक चिन्हित और संबोधित जा सकने वाली इकाई का नाम हो तभी गांधी के सपनों का भारत बनेगा। उस गांधी के अलावा शेष सभी गांधी फर्जी हैं। जिस देश में गांधी की हत्या हो चुकी हो उसमें अब हमारी-तुम्हारी ही बारी है। अगर कायर हो तो चुप रहो, रजाई तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। अगर दम है तो बाहर निकलो। कुछ तो बोलो। अभिव्यक्त को सारे खतरे उठाने ही होंगे, लेना होगा सच बोलने का संकल्प। यह द्वंद्व सच बोलने के संकल्प और शातिराना चुप्पी के विकल्प के बीच है। हम तो विकल्प नहीं संकल्प की बात करेंगे।

(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in February 6, 2010 Issue)

Sunday, January 24, 2010

Replica of Republic

We have rushed to you in the New Year like a fresh breeze. Nothing has changed, though, except the calendar and once again we shall vindicate the victory of the Dictator. On our Republic Day January 26, we recite our National Anthem Jan-gan-man-adhinyak jai he Bharat bhagya vidhata… But have we ever wondered what it means in letter and spirit? Jan-gan means "we, the people" and adhinayak means "dictator" and jai means "victory". So, a plain and simple translation of our National Anthem would be: "We, the people, the down-trodden by their minds wish victory to the dictator who is the ultimate fountainhead of Indian fortune." We, the people of India have by their collective wisdom have adopted Democracy instead of Dictatorship. How then we can wish a victory for dictator? But we are compelled to do so.
One celebrated principle of logic is "an erroneous base sentence would always result in wrong conclusions." In electoral parlance, a conclusion means mandate. The base sentence of our National anthem is "Jan-gan-man adhinayak jai he" (We, the people collectively wish victory to the Dictator). The fundamental principle of democracy is that sovereignty 'belongs' to the people. Our Constituent Assembly has made the declaration that the sovereignty is 'derived' from the people. That is the dangerous departure from the generally accepted principle of democracy. We, the people of India have a pathetic tale of toil, torture and trauma seduced by the 'system' and adduced by the Dictator. We have had already flattered the Dictator for last 60 years expecting the democracy to deliver but in vain. Is mother India incapable to deliver?
Have a look at the leaders of our freedom movement- Gandhi, Tilak, Lala Lajpat Rai, Nehru, Subhash Chandra Bose, Bhagat Singh, Chandra Shekhar 'Azad', Ram Prasad Bismil and Ashfaq. They all were born before independence. But we did not produce even a single leader post-independence whom we could cite as an icon. In every society, youth needs an icon – actual or fictional – to emulate. If it is not Hanuman then it could be Pokemon. Since political leaders have lost their charm and bonafide so we have been left with no other option but to adopt personalities from our film industry or sports as icon. The youth of this nation does not want to be yet another Gandhi, Bhagat Singh, Chandra Shekhar 'Azad' or Subhash Chandra Bose. Rather, he would prefer to be like the Scindias. Or, if is Gandhi, then it is certainly not the Mahatma Gandhi type but of Rahul-Prinka type. Nobody knows what happened to the progeny of Rani Laxmi Bai of Jhansi but everybody knows about Scindias who opted to backstab the freedom movement in general and Laxmi Bai in particular by siding with the British. Scindia's are still ruling the roost be it BJP or the Congress. We are no more interested in the grandson of Nana Phadnavees or Tatya Tope who still reside at Bithoor (Kanpur). For us the blood and the blood line of Rani Laxmi Bai, Bhagat Singh, Bismil, Ashfaq etc are lost forever and who shall succeed the European origin Sonia? Obviously it will be the half-European Rahul.
We praise adhinayak and not the loknayak (mass leader). We are a clone of colonial Constitution. As in our National Anthem, we appear to stand in support of dictatorship instead of democracy. Be it Judiciary, Legislature, Executive or even the Press, every functionary is trying to impose its dictatorial superiority. Judges hesitate to declare their assets. It would be hundred per cent dishonest to say that the judicial system is honest. At the lower court, District Judge or Munsif Magistrate level one just has to watch the handshake between the Court's Reader (Peshkar) and litigants – their transaction is not of emotions alone.
We must talk about the dictatorial attitude of our Union Legislature that is Parliament. The nation has seen the goings-on live on television. The voice that addresses the nation from the ramparts of the Red Fort is that of a person who not widely known to the nation but the name is associated in hushed tones with a chit fund case, a cooperative society scam. Manmohan Singh also qualifies this debate. The Prime Minister is not elected but "appointed" in India so they are not the legitimate child of our "ballot" or to say democracy. Rather, they could be described as "test-tube baby" of this system.
(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in January 16, 2010 Issue)

अधिनायक की जय करते खलनायक

लो हम आ गए हवा के  ताजे झोंके  की तरह। इस बीच कुछ भी नहीं बदला। बदला है तो बस कैलेंडर का फड़फड़ाता पन्ना। एक बार फिर 'गण' की सवारी करने तिरंगा हाथ में लेकर 'तंत्र' आ गया। गणतंत्र दिवस पर 'गण' गुनगुनाएगा ''जन-गण-मन अधिनायक जय हे! भारत भाग्य विधाता।'' कौन है और कैसा है भारत का यह 'जन-गण-मन' और क्यों अधिनायक की जय कर रहा है? 'अधिनायक' यानी तानाशाह की जय जहां होगी, वहां फिर लोकतंत्र कैसा? दर्शन शास्त्र की दो विधाएं हैं- नीतिशास्त्र और तर्कशास्त्र। तर्कशास्त्र का सिद्धांत है कि ''जब आधार वाक्य ही गलत होगा तो निष्कर्ष सदैव भ्रामक निकलेंगे।'' यही हो रहा है हमारे राष्ट्रगान के साथ। इसका आधार वाक्य 'जन-गण-मन अधिनायक जय हो' ही गलत है तो निष्कर्ष भी भ्रामक ही होगा। निष्कर्ष से यहां अभिप्राय 'जनादेश' से है। गुजरे साठ सालों में भारतीय 'जन-गण-मन' की कमर 'तंत्र' की तानाशाही ने तोड़ दी है और अधिनायक की जय-जयकार करते हुए देश में खलनायक तो खूब हैं पर 'लोकनायक' के जन्म की संभावना शेष नहीं है।

राष्ट्र के प्रतीक नामों पर गौर करें- गांधी, लोकमान्य तिलक, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला, जयप्रकाश नारायण, सावरकर आदि-आदि। सभी आजादी से पहले जन्मे थे। स्वतंत्र होने के बाद देश का वातावरण ऐसा नहीं रहा कि इस तरह के एक भी प्रतीक चरित्र यह राष्ट्र पैदा कर पाता। परिणाम कि गुलाम भारत के युवाओं के प्रतीक सुभाष होते थे तो आज शाहरुख खान हैं। इसीलिए तल्खी में एक तनकीद की गई है- ''गालिब ने झुककर टैगोर के कान में कुछ यूं कहा- चुप रहो अब मुल्क का कौमी  तराना ईलू-ईलू हो गया।'' देश का युवा अब गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसा नहीं बनना चाहता। वह इस छल को जान चुका है कि राष्ट्र के लिए खून देने वाले लोग इस राष्ट्र के अधिनायकवादी तंत्र द्वारा भुला दिए जाते हैं और याद किए जाते हैं वह लोग जिनके बाप-दादे अंग्रेजों के समय चाटुकारिता कर रायबहादुर, राय साहब बने थे और आज भी आनंद में ओत-प्रोत हैं। रानी लक्ष्मीबाई के किसी वंशज का कहीं कोई पता है? वह भारत की स्वतंत्रता सेनानी थी इसीलिए। लेकिन 'सिंधिया' को सभी जानते हैं, जबकि इस खानदान द्वारा अंग्रेजों की तरफदारी करके रानी झांसी लक्ष्मीबाई मरवा दी गई थीं।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पाखंडी च्यवनप्राश खाने वाले भाजपाइयों को राजमाता सिंधिया आदरणीय लगती थीं, किंतु रानी झांसी का कोई वंशज नहीं। माधवराव सिंधिया सत्ता भोगे और छोड़ गए अपने पीछे ज्योतिरादित्य सिंधिया। उधर राजस्थान में भी वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा की कृपा से मुख्यमंत्री पद भोग चुकी हैं और यशोधरा राजे सिंधिया भी 'जन-गण-मन' की छाती पर सवार हैं। रामप्रसाद बिस्मिल की बहन शाहजहांपुर में चाय की गुमटी लगाए अगर उदास आंखों से तिरंगा देखती हैं तो देखा करें। बिठूर में नाना फड़नवीस और तात्या टोपे के खानदानियों का कोई पुरसाहाल नहीं है। तो 'अधिनायक जय हो' करते करते हमने किस 'भारत' के कौन से 'भाग्य विधाता' बना डाले? यह भारत तो भाग्यविधाता है राहुल, प्रियंका, ज्योतिरादित्य और जितिन जैसे लोगों का। हम तो इस राजतंत्र में रहते हुए मंथरा के वंशज बना दिए गए हैं। हम बच्चों को देश का लोकतांत्रिक संचालक स्वामी नहीं नौकर बनाना चाहते हैं। फिर चाहे वह प्रथम श्रेणी हो या चतुर्थ श्रेणी। 'अधिनायक' की जय जयकार करते हुए इतिहास की पगडंडियों पर हमारा जो उपहास हुआ है उसे हम भूले नहीं हैं। फिर भी लोकतंत्र के नाम पर षड्‌यंत्र करते हुए जो खलनायक 'अधिनायक' बन बैठे उन पर हमने कभी गौर किया? सत्ता के सभी अंग- न्यायपालिका, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका अपनी-अपनी सुविधाओं की तानाशाही पर आमादा होकर 'अधिनायक जय हो' कर रहे हैं। न्यायपालिका का चेहरा भ्रष्टाचार के आरोपों से आक्रांत दिख रहा है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के जज अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने से कतरा रहे हैं। भविष्य निधि घोटाला जैसे सुनियोजित घोटाले भी अब उजागर हो रहे हैं। मुलायम सिंह - अमर सिंह की कृपा से सर्वोच्च न्यायालय का एक मुख्य न्यायाधीश अगर नोएडा में बेशकीमती जमीनें पा जाता है तो दिनाकरन मुद्दे पर दूसरे खुलकर जातिवादी कार्ड खेलते नजर आ रहे हैं। वैसे भी 'न्याय' नागरिक को मुफ्त में तो नहीं मिलता। पेशकार अहलमद के गुलछर्रे का गणित तो सभी जानते हैं और किसका कौन खास है इसका भी ख्याल न्यायनीति निर्धारित करती है। लेकिन अवमानना का कानून हमें बोलने और पूछने से रोकता है। अब भला जज साहब से यह कौन पूछे कि- आप के पास आय के ज्ञात स्त्रोत से अधिक पैसा कैसे आया? कभी सुना है कि किन्हीं जज साहब के यहां आयकर का छापा? यह थी न्यायपालिका के अधिनायक की जय।

व्यवस्थापिका और विधायिका के अधिनायक की जय की भी बात हो जाए। लालकिले के प्राचीर पर खड़े होकर संपूर्ण राष्ट्र को अपने आगे नतमस्तक देखने वाली प्रतिभा पाटिल का नाम 'सोनिया कृपा' के पहले कितनों ने सुना था और सुना भी था तो क्यों? चिटफंड की धोखाधड़ी, चीनी मिल सहकारी समितियों की हेरा-फेरी की फेहरिस्त उतनी ही लंबी है जितना उनका वैभव। किन्तु आज वह राष्ट्रपति हैं- हुई न अधिनायक की जय। मुंडा हो, गुंडा हों, रेड्‌डी हों या गुरुजी सभी जगह खलनायक अधिनायक बनते प्रतीत हो रहे हैं और यह मनमोहन सिंह नामक प्रधानमंत्री बैलेट की वैध संतान है या लोकतंत्र के प्रयोग का परखनली शिशु यह तो बताओ हे मतदाता! तुम्हें पता है सब, फिर खामोश क्यों हो?
(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in January 16, 2010 Issue)

Friday, January 22, 2010

Infected Socialism

  • Saifai warrior faces shaky ground
Nobody imagined that the belligerent Samajwadi Party shall one day appear cowed down - that too before a non-fighter. The bluff of aggression has been called, and the call of rebellion is getting conveyed to the portals of 10 Janpath.  All through this, the dimensions and ethos of the Socialism that started from Saifai (Etawah) have changed inevitably. The red-cap Socialism initiated by Ram Manohar Lohia, the socialism of legislator Natthu Singh from Karhal (Mainpuri), the socialism of 'Commander' Arjun Singh Bhadauria, Chaudhary Saligram  and Chaudhary Ram Swaroop of Kuiya village, the socialism that was the essence of Etawah's local  newspaper Desh Dharm started by veteran journalist Devi Dayal Dube - all have been left far behind by the present-day Samajwadi Party that appears doomed to suffer an ideological vacuum. In any case, the process to dispense with the dreams of Lohia had started in bits and pieces in 1980 itself, but the rot came to the surface only recently when the tycoon-Thakur Amar Singh voiced the words of rebellion after the ignominious defeat at Firozabad.

In the mean time, Socialism was taking an off-and-on ride on Subrata Roy Sahara's aircraft and the Cycle was nowhere to be found. The glorious cycle-borne Samajwadis were recalled only before elections. The decline of the socialist character has completed a full circle and a new innings has to start afresh. But then whose innings are we talking about - Prof. Ram Gopal Yadav, Akhilesh, Shivpal or Prateek? This untimely dilemma is stopping the Samajwadi struggle from coming out on the streets, and is keeping the ignominy confined to within closed doors. The party that once had the penchant to obstruct the passage to power of others now faces the same obstructions, albeit created by their own ilk. For instance, what kind of socialism was it that led Ram Singh Shakya to lay down a caste-based calculation to ensure the defeat of fellow socialist leader 'Commander' Arjun Singh Bhadauria from Etawah Lok Sabha seat in 1980? In the 90s, sending the late debutant Kanshi Ram of the BSP to the Lok Sabha from Etawah in a manner of cutting one's nose to spite the face was intended to announce the party's arrival on the political firmament in a big way, followed by a coalition government with BSP. And today, the same BSP and its chief Mayawati have ensured that the Samajwadi Party is close to extinction in Uttar Pradesh.

The socialism that started from Saifai has slowly but surely grown richer, only to acquire the face of an urban neo-feudalism. Samajwadi Party's socialism has got weakened but its economics has grown stronger. The political aces have been played. When bandit queen Phoolan Devi was brought into politics, it brought to the fore the Samajwadi party's anti-Thakur image since Phoolan Devi carried the charge of mass killing of Thakurs. The subsequent mysterious killing of Phoolan Devi in Delhi, the equally mysterious advent of Amar Singh in the power structure of Samajwadi Party, and then, the mysterious killing of entire family members of advocate Vijay Singh Sengar including himself in Etawah gave an indication of changing social and moral values in the party.

Convenience and comfort are increasingly becoming important for the party cadres who have lost the will and passion for struggle. The equations of caste seem to have lost their importance. The fragmentation could have been stalled only if Mulayam Singh Yadav had challenged the BSP, but he is very cleverly avoiding any such conflict. Instead of actually waging a political battle, he simply wants to be seen as doing so. Now not even a section of the press is standing with him in building his image because now he does not hold the strings of the discretionary fund he had with him.

The 'M-Y' (Muslim-Yadav) combination that had been formed on the debris of Babi Masjid, seems to have given way on this anniversary of the infamous demolition. Allahabad's Atiq Ahamad, Rampur's Azam Khan, Balrampur's Rizwan Zaheer have been thrown out like used packs. Kurmi leader Beni Prasad Verma, Lodhi leader Ganga Charan Rajput and Dhani Ram Verma have jumped off the sinking ship. It would appear that Mulayam Singh Yadav wanted only flag-bearers of his clout rather than self-respecting political activists. For this reason the Samajwadi Party is in a state of utter chaos, and everyone appears defeated even before the actual war has begun.

In between, there have been many transitions on the political scene. In 1984 there was a deadly attack on Mulayam Singh Yadav at Maikhera village near Karhal in Mainpuri. The then Karhal MLA Natthu Singh Yadav had stood like a rock with Mulayam. Even otherwise, credit goes to Natthu Singh for having brought Mulayam into active politics. That was the time when Mulayam too was overawed by the political and criminal clout of Balram Singh Yadav. Gradually Mulayam emerged as the only leader and other bastions of Yadav power were marginalised. Those being Natthu Singh's son Subhash Yadav in Karhal, Darshan Singh Yadav in Etawah, Ramsewak 'Gangapura', Ashok Yadav in Shikohabad, Latoori Singh in Etah and then his son Avadh Pal Yadav, D P Yadav in Bulandshahar, Umakant and Ramakant Yadav in Azamgarh and Mitrasen Yadav in Faizabad. Veteran Janeshwar Mishra - once revered as 'Chhote Lohia' - got marginalized. But unknown to the supremo, these very tricks soon gave way to the party's decline. Yadav politics was overshadowed by family politics, and now Samajwadi Party is no more a political party but is perceived as a business firm 'Mulayam Singh and Sons (P) Ltd' and 'Mulayam Singh Brothers (P) Ltd.' Yadavs often ask why is it that the daughters-in-laws of this so-called first family are from non-Yadav families. Will the Yadavs of Saifai accept Prateek also as a Yadav scion like Akhilesh? Has the Samajwadi Partys aged with Mulayam Singh or some force is still left in the youthful leadership of Akhilesh? And, what kind of revolution has been brought about by the likes of Jayaprada? Questions are many, answers are awaited.
(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in January 16, 2010 Issue)

Time for a fresh look

We take pride in telling you that the new magazine you are browsing through is born out of our collective conviction. Breaking away from the shackles of the prevailing conditions, pre-conceived notions and prejudices, we plan to take a fresh look at the world. And there are some questions that are bound to be thrown at us: What is the need for launching yet another magazine?

Well, the objective is to stick to objectivity, keep away from the vicious clutches of any pre-conditions and dare to tell the truth. But how do we claim to be different from other news magazines? Do we really understand our responsibility towards society which is turning into a wasteland?

The same set of questions crossed our minds too. In fact, we feel that as a society, we are trapped in a vicious cycle, not knowing where we are headed. So these questions force us to take clear, concrete, concerted and corrective steps to bring about changes in society and to show corrupt and dishonest people their place. In our strife-torn society we are cursed to a state of constant conflict.

To our mind, there are only three types of "conflict" – between Man and Nature, Man and Man, and between Man and the Man within. We would make it incumbent upon warring factions of society to implead us. Many may not remember, but the (dis) credit for a plane hijack was registered against Palestinian leader Yaser Arafat. Then came a day when the same Arafat was awarded the Nobel Peace Prize! Similarly, dacoit-turned-politician Phoolan Devi's name was also recommended for this coveted award. And the day US President Barack Obama received the peace prize for his initiative shown in the Afghan war one could hear the soul of Lord Buddha cry out in agony. In the words of Charlie Chaplin, "One murder makes a villain  / Hundred a hero, / Numbers sanctify".

One may also recall, Norway came forward to the rescue of Prabhakaran and his dreaded outfit LTTE in Sri Lanka. It is the same country that awards the Nobel Peace Prize and also provides financial aid to several NGOs.  Amidst all this, the questions that come to one's mind are - Where do Indians figure in this era of globalisation?  Whether this is a globalisation of wealth or a globalisation of poverty? So, when we, at By-Line, will speak of the prosperity of our nation, we would certainly demarcate disparity. We will certainly not ignore the oblique motives of every Mulayam, Maya, Manmohan and Montek. We also believe that a dialogue is a two-way communication. We have our own parameter to encompass globalisation afresh. As we have a right to know whether this is a globalisation of poverty or of wealth.

For us (Team By-Line), our committed reader is not merely a "consumer" but a valuable member of the extended By-Line family. We would always be with them in their quest for justice. And lest we forget, in a democracy everyone is a part of the crew. We are not a group of "independent journalists"; rather, we wish to be "dependent". Dependent on truth, that is! We are here to dig out the truth and fight tooth and nail against injustice of every hue. We are emerging from a kind of darkness where the "old" needs revision and the "new" an expression. We don't know how successful we will be in this bold endeavour but we certainly can say this:

Mortality of efforts can't prevent us
from making scratches on seashore.

संक्रमित समाजवाद

  • सवालों की सूली पर सैफई का सूरमा
सोचा भी न था कि सपा सहम जाएगी। सहम गई वह भी शिखण्डी से। पुरुषार्थ की पोल और अब उसका ढोल बज उठा है। बनिएनुमा बाबू साहब की बगावत एक ओर ठिठकी खड़ी है दूसरी ओर मुलायम इस उड़ती चिड़िया को चुगा डाल रहे हैं। इस बीच सैफई (इटावा) से चले समाजवाद के स्वरूप भी बदले हैं और संस्कार भी। लोहिया का लाल टोपी वाला समाजवाद, करहल (मैनपुरी) के विधायक नत्थू सिंह का समाजवाद, कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया के साथ सीखा समाजवाद कुइया गांव के चौधरी शालिग्राम, चौधरी रामस्वरूप से सखा भाव में सीखा समाजवाद, पूर्वज पत्रकार देवी दयाल दुबे के देश धर्म अखबार की इबारत बनने वाला समाजवाद बहुत पीछे छोड़ आज समाजवादी पार्टी ने स्वयं को वैचारिक वीरानगी भोगने को अभिशप्त कर लिया है। वैसे तो लोहिया के सपनों को भी आसान किश्तों में श्रद्धांजलि देने का सिलसिला 1980 में ही शुरू हो गया था, लेकिन सतह पर तब आया जब बनियेनुमा ठाकुर अमर सिंह ने फिलहाल ही फिरोजाबाद की हार न पचा पाने की पहली डकार ली थी। इस बीच लोहिया का समाजवाद साइकिल से उतरकर सुब्रतराय सहारा के हवाई जहाज पर चढ़-उतर रहा था और साइकिल लावारिस थी। स्वाभिमानी साइकिल सवार समाजवादियों की सुध तो तभी आती थी कि जब चुनाव हों। समाजवादी चरित्र के पतन की परिक्रमा पूरी हो चुकी है अब नई पारी की नई तरह से शुरुआत हो तो बात बने, और बात भी किसकी? - प्रोफेसर राम गोपाल की, अखिलेश की, शिवपाल की, प्रतीक की। यही असमय का असमंजस सपा को संघर्ष की सड़क पर नहीं आने दे रहा बल्कि कमरों की कलह में कैद किए है।
दूसरों के राज सत्ता के मार्ग में बबूल बोने की प्रवृत्ति का पराभव अपने पैरों में चुभते अपने ही बोए बबूल के कांटे निकालते हो रहा है। 1980 में समाजवादी नेता कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया को इटावा लोकसभा से हराने के लिए रामसिंह शाक्य का जातीय गणित कौन सा समाजवाद था? कभी भी अपने बलबूते संसद न देख पाने वाले बसपा के साहब कांशीराम को इटावा से लोकसभा भेजकर मुलायम सिंह ने अपने लिए भविष्य का भस्मासुर तैयार किया था। उत्तर प्रदेश में सरकार भी बनाकर एक नए जातीय राजनीतिक शिल्प का शिलान्यास भी कर डाला था। आज उन्हीं कांशीराम की बसपा और बसपा की सुप्रीमो मायावती मुलायम सिंह को राजनीतिक रूप से मुलायम कर चुके हैं।
इस बीच सैफई से चला समाजवाद धीरे-धीरे सम्पन्न होता हुआ नव सामन्तवाद का शहरी स्वरूप हो चुका है। अमर सिंह की अगुवाई में समाजवादी पार्टी का समाजशास्त्र कमजोर और अर्थशास्त्र बहुत मजबूत हुआ है। राजनीति के तुरुप के पत्ते अब चले जा चुके हैं। डकैत फूलन देवी को जब राजनीति में लाए थे तब सपा का चेहरा ठाकुर विरोधी उभरा था, क्योंकि  बेहमई काण्ड में फूलन देवी पर ठाकुरों के सामूहिक संहार का कलंक था फिर फूलन देवी के दिल्ली में सपा के इटावा सांसद के पास जाते हुए हुई रहस्यमयी हत्या और अमर सिंह की उतनी ही रहस्यमयी सपाई शुरुआत अभी लोग समझ भी न पाए थे कि इटावा में विजय सिंह सेंगर - एडवोकेट के परिवार की रहस्यमय हत्या बदलते सामाजिक व चारित्रिक समीकरणों के सवाल ही खड़े कर गई।
संघर्ष से कतरा रहे हैं मुलायम
दरअसल सुविधाजीव हो चुकी सपा में अब संघर्ष का माद्‌दा शेष नहीं बचा है। जातीय गणित का झुनझुना अब बेसुरा सा लगता है। बिखरते वोट बैंक की राजनीति तभी संभल सकती थी कि जब मुलायम सिंह बसपा से कोई संघर्ष करते पर वह बड़ी चालाकी से संघर्ष करने से कतरा रहे हैं। वह अब राजनीतिक युद्ध करना नहीं चाहते महज युद्ध करते हुए दिखना चाहते हैं। 'छवि' बनाने के काम में अब 'प्रेस' का एक खास वर्ग भी उनके साथ नहीं क्योंकि 'विवेकाधीन कोष' अब उनके विवेक पर भारी नहीं पड़ पा रहा है और वह उसकी व्यावहारिक पुनरावृत्ति चाहते हैं। बाबरी मस्जिद की शहादत से बना 'मुया' यानी मुसलमान-यादव गठजोड़ बाबरी मजिस्जद की इस बरसी पर पर ढह गया। इलाहाबाद के अतीक अहमद, रामपुर के आजम खां, बलरामपुर के रिज़वान जहीर इस्तेमाल हो चुके खाली डिब्बों से बाहर फेंके जा चुके हैं। कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा, लोधी नेता गंगाचरण राजपूत, धनीराम वर्मा एक-एक कर डूबते जहाज से कूद-कूद कर भाग चुके हैं। दरअसल मुलायम सिंह को सत्ता की पालकी ढोने वाले कहार चाहिए थे, क्रान्तिकारी कद्दावर स्वाभिमानी नेता नहीं। इसीलिए सपा में भगदड़ है और हमले के पहले ही यह लोग हताश दिखाई दे रहे हैं।
समाजवाद की अगुवाई अब छात्र राजनीति के मोहन सिंह या आनंद कुमार जैसे समझदार लोग नहीं करते। अब तो तबले, हरमोनियम और सारंगी से समाजवाद की धुन सुनाई जा रही है और लोहिया के समाजवादी स्वप्न-दोष की नायिका हैं जयाप्रदा। अमर सिंह के साक्षात दर्शन भर से मृत लोहिया की तस्वीर भी आंदोलित हो जाती होगी ऊपर से नए समाजवादी संजय दत्त की नई नवेली 'सेकिंड हैंड' बीवी मान्यता से लेकर मनोज तिवारी का समाजवाद सुब्रत राय सहारा और अनिल अंबानी का समाजवाद सैफई के समाजवादियों को संकट के समय न उधर करहल की तरफ दिख रहा है इधर हेंबरा इटावा की तरफ। सवाल यह भी है कि जयाप्रदा जैसों की जनानी क्रान्ति कितना समाजवाद लाई है? और अमर सिंह की ''देहिक - दैविक- भौतिक ताप'' हरने की क्षमता की सपा को क्या और जरूरत नहीं है?
इस बीच सियासत की सड़क पर कई साथ आए और गए। 1984 में मैनपुरी करहल के पास मईखेड़ा गांव में मुलायम सिंह पर कातिलाना हमला हुआ था। करहल विधायक रहे चौधरी नत्थू सिंह यादव ने स्तम्भ की तरह मुलायम सिंह का साथ दिया था। वैसे भी नत्थू सिंह यादव को ही मुलायम सिंह को छात्र राजनीति से विधायी राजनीति में लाने का श्रेय है। यह दौर वह था कि जब बलराम सिंह यादव के राजनीतिक-आपराधिक दबदबे से मुलायम सिंह भी आक्रांत थे। धीरे-धीरे मुलायम सिंह यादवों के एक मात्र नेता के रूप में उभरे और इस क्रम में बड़े यादव छत्रप हशिए पर धकेल दिए गए। करहल में नत्थू सिंह के बेटे सुभाष यादव, इटावा में दर्शन सिंह यादव, रामसेवक (गंगापुरा), शिकोहाबाद में अशोक यादव, एटा में लटूरी सिंह और फिर उनके बेटे अवधपाल यादव, बुलंदशहर में डी.पी. यादव, आजमगढ़ में उमाकांत रमाकान्त यादव, फैजाबाद के मित्रसेन यादव आदि। यही उत्थान के दांव पतन की पगडंडी कब बन गए सैफई के सूरमाओं को पता भी नहीं चला। यादव राजनीति पूरे परिवार से आक्रान्त हो गई और आज समाजवादी पार्टी एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि व्यापारिक फर्म के स्वरूप में है - 'मुलायम सिंह एण्ड सन्स प्राइवेट लिमिटेड' और 'मुलायम सिंह ब्रदर्स प्राइवेट लिमिटेड'। कभी छोटे लोहिया यानी जनेश्वर मिश्र का कद समय के साथ बढ़ा नहीं, घटकर और छोटा हो गया। यादवों में सवाल है कि इस 'प्रथम' प्रतीत होते राजनीतिक परिवार की बहुएं गैर यादव जातियों से क्यों हैं? सैफई के यादव क्या प्रतीक को भी अखिलेश जैसा ही शत-प्रतिशत यादव मानेंगे? क्या मुलायम के साथ समाजवादी पार्टी भी बूढ़ी हो चली है या अखिलेश की अगुआई में अंगड़ाई अभी शेष है?
(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in January 16, 2010 Issue)

पक्षधरता की पहल

एक पत्रिका आकार ले रही है। शर्त, अनुबंध, आग्रह, पूर्वाग्रह की परिधियों से दूर की दुनिया की पैमाइश करने की  पशोपेश भी इसका मकसद है। सवाल है कि टीवी चैनलों की चिचियाती आवाजों व समाचार सुंदरियों के शोख अंदाजों की बीच सच की संकटग्रस्त आवाज को कौन सुनेगा और सुनाएगा? आखिर एक और समाचार पत्रिका की जरूरत ही क्या थी? क्या अपने गुरुत्व और अक्षांश का बोध हमें है? हमारा सैद्धांतिक ध्रुव क्या है और धुरी कितनी मजबूत है? क्या हम किसी कुतुबनुमा का काम भी कर पाएंगे?- निश्चय ही इन सवालों के जंगल के बीच हमारी पगडंडी जाती है और इस पगडंडी पर प्रकाश के लिए कोई ट्‌यूबलाइट नहीं। बस पत्रकारिता के कुछ उत्साही जुगनुओं का जुनून है।

जहां सिद्धांत, शून्य से एक सौ अस्सी अंश तक मनचाहे तरीके से तोड़े-मरोड़े जाते हों। जहां विधायिका बांझ और न्यायपालिका नकारा हो। जहां समाचारों के नाम पर षड्‌यंत्रों का प्रचलन हो। जहां सच के सैकड़ों संस्करण बाजार में मौजूद हों। जहां 'आम आदमी' की जुबान भी खींच कर खास आदमी ने तह करके अपने पर्स में रख ली हो। जहां भूखे पेट भरे गोदाम हों। जहां देश का देसी 'जन-गण-मन' अपने ही देश के कई प्रदेशों से खदेड़ा जा रहा हो। जहां राष्ट्र में एक 'महाराष्ट्र' हो। जहां न्याय अपवाद और अन्याय परंपरा हो। ऐसे हमलावर दौर में हम आ रहे हैं मुर्दा हो चुके समाज के मुद्‌दई बनकर और शेष बचे सिसकते जिंदा समाज की जुबान बनकर। हमारा संकल्प है सार्थक शब्दों का सृजन।

भ्रष्टाचार ने अपनी हिफाजत के लिए शिष्टाचार का जो किला गढ़ा है हम उसे दरकाने आए हैं। आपकी खौफजदा खामोशी, चतुर चुप्पी को शिष्टाचार बताया जा रहा है और चीख या वेदना की कोई अभिशिप्त आवाज उनके शातिर शब्दकोश में अशिष्टता कही जाती है। इस रहस्यमयी खामोशी को हम अपनी खलिश की खटखटाती आवाजों से तोड़ेंगे। प्रशासन भी उनका, पुरस्कार भी उनके और इन प्राचीरों के पहरेदार भी उनके, पुरस्कृत भी वही। ऐसे में हम तिरष्कृत की आवाज बनेंगे।

जिस दिन दुनिया के पहले विमान अपहरणकर्ता आतंकवादी याशर अराफात को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। जिस दिन कुख्यात डकैत फूलन देवी का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए चला था। जिस दिन अफगान युद्ध के लिए स्वयंभू सूरमा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा था, उस दिन हर कसाई के खंजर पर शांति लिखा जा रहा था। उस दिन हर बुद्ध फफक-फफक कर रोया था। शातिराना शांति, विवशता की शांति, बुद्धू की शांति और बुद्ध की दैवीय शांति का अंतर समझने और समझाने का अवसर आ गया है।

नार्वे वह देश है जो श्रीलंका सरकार से लिट्टे की पक्षधरता करते हुए मध्यस्थता करता है। यह वह शहर है जहां से ऑक्सफेम सहित तमाम एनजीओ मार्का स्वयंसेवकों की समृद्धि के अनुदान आते हैं। जहां तमाम शातिरों को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाता है। इस बीच वैश्वीकरण की जो बहस तमाम स्वयंभू कोलम्बसों और गूलर के भुनगों के बीच जारी है। इस बहस में भारत का 'जन-गण-मन' कहां है? यह वैभव का ही वैश्वीकरण है कि गरीबी का भी वैश्वीकरण होगा? जब हम समृद्धि के समाज की बात करेंगे तब तमाम मुलायम, माया, मनमोहन, मोंटेक की पत्रकारीय उपेक्षा नहीं होगी। रोशनी, रास्ते, राशन, रोजगार और राजनीति पर शहरों का कब्जा है। हम गांवों के अंधेरे को साक्षी मान शहरों के टिमटिमाते उजाले से सवाल करेंगे कि क्यों शहर, गांवों को लील रहे हैं? क्यों कृषि लाभकारी नहीं है? क्यों है यह न्याय का असंतुलन। इस हमलावर दौर में हमने सबसे अलग एक कदम उठाया है। किसी सार्थक सुधार का सुनहला सपना हम नहीं दिखा सकते। हमको इस अदम्यता में अपने अकेलेपन का अहसास है। हमें क्रांति की मशाल होने का दंभ भी नहीं है, लेकिन हमें हक है अगरबत्ती की तरह सुलगने का, सुगंध फैलाने का। सच की आध्यात्मिक सुगंध।

निष्पक्ष और बांझ पत्रकारिता से ऊबकर हम पक्षधरता की पत्रकारिता करने आए हैं। झूठ के विरुद्ध सच की पक्षधरता, अन्याय के विरुद्ध न्याय की पक्षधरता, भ्रष्टाचार के विरुद्ध ईमानदारी की पक्षधरता, अंधेरे के विरुद्ध उजाले की पक्षधरता, कातिल के विरुद्ध कातर की पक्षधरता। सभी कीड़ों के विरुद्ध कीटनाशक की पक्षधरता। मच्छर के विरुद्ध 'ऑल आउट' की पक्षधरता। राष्ट्रद्रोही के विरुद्ध राष्ट्रवादी की पक्षधरता। हर अफजल गुरु के विरुद्ध उसे फांसी दे सकने वाले वाले जल्लाद की पक्षधरता।

कुल मिलाकर हर कसाई के विरुद्ध हर बकरी की पक्षधरता, हर कातिल के विरुद्ध किसी बूढ़े गांधी की पक्षधरता की पत्रकारिता करने हम आए हैं। भय से लड़ सकने वाले हर भगत सिंह की पक्षधरता हमारा संकल्प है। कुल मिलाकर कातर क्रोंच की तरह यह असहाय पीढ़ी तड़प रही है। सभ्यता को बुद्ध चाहिए। चूंकि हम स्वर हैं, इसलिए नश्वर नहीं हैं। पत्रकारिता की छोटी हथेली पर हमारी जीवन रेखा कितनी लंबी और गहरी है, यह कोई स्वयंभू ज्योतिषी ही बताए। मुझे बस इतना पता है कि -

रेत पर लकीरें खींचकर,
इस डर से कि वह मिट जाएंगी।
स्थगित नहीं किया जा सकता,
किसी भी हादसे से टकराना।
(Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in January 16, 2010 Issue)